लब्जो की छुरी ..........
प्यार ही तो था किया ,
फिर क्यूँ चलाईं ये लब्जो की छुरी |
करती रही अरमानों से , मंशा उसकी पूरी
फिर भी जान न पाई ,उसकी नजर की छुरी |
आती है हसी खुद पर बेतहाशा हंसी ,
जो मान बेठी उसको खुद से जुड़ी |
प्यार ही तो था किया ,
फिर क्यूँ चलाईं ये लब्जो की छुरी |
सोचा ! अनोखी है मोहब्बत हमारी ,
चाहत थी बेपन्हा तुम्हारी |
पर सुबहा के ढलते शाम मे ,
उजड़ गई ये दुनिया सारी ||
प्यार ही तो था किया ,
फिर क्यूँ चलाईं ये लब्जो की छुरी |
दिलाया था उसने भी आइतबार मुझे ,
साथ ही ! किया था कुछ प्यार भी मुझे |
ये दिल ,क्यूँ दी थी पनहा उसे
जो रहे गई उन लम्हों की चाहत अधूरी ||
प्यार ही तो था किया ,
फिर क्यूँ चलाईं ये लब्जो की छुरी |
-sonamsaini..................
Woww👏👏👏👏
ReplyDeleteNYC👌
ReplyDeleteShurkiya...
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